लोकतंत्र उन सवालों को खामोश नहीं कर सकता, जो उसे जीवंत बनाए रखते हैं: चुनावी निष्पक्षता, विरोध के अधिकार और संवैधानिक जवाबदेही पर एडवोकेट सना रईस खान

News Desk16 October 20261 min read0 viewsदेश
लोकतंत्र उन सवालों को खामोश नहीं कर सकता, जो उसे जीवंत बनाए रखते हैं: चुनावी निष्पक्षता, विरोध के अधिकार और संवैधानिक जवाबदेही पर एडवोकेट सना रईस खान

लोकतंत्र उन सवालों को खामोश नहीं कर सकता, जो उसे जीवंत बनाए रखते हैं: चुनावी निष्पक्षता, विरोध के अधिकार और संवैधानिक जवाबदेही पर एडवोकेट सना रईस खान

“लोकतंत्र की ताकत इस बात से नहीं मापी जाती कि वह असहमति को कितनी कुशलता से नियंत्रित करता है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह असहमति का कितनी साहसपूर्वक जवाब देता है।”

लोकतंत्र उन नागरिकों के विश्वास पर टिका होता है, जो अपनी संस्थाओं पर भरोसा करते हैं। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision — SIR) को लेकर उठ रही चिंताओं का समाधान पारदर्शिता, सत्यापन योग्य आंकड़ों और उचित स्वतंत्र जांच के माध्यम से किया जाना चाहिए। प्रत्येक पात्र नागरिक को अपना वोट डालने और उसके मत की गणना सुनिश्चित होने का अधिकार है। चुनावी निष्पक्षता से जुड़े सवालों के स्पष्ट और तथ्यों पर आधारित जवाब दिए जाने चाहिए।

शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी एक कार्यशील लोकतंत्र के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून के तहत कुछ प्रतिबंध आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन असहमति को अपने आप में खतरा नहीं माना जाना चाहिए। नागरिकों को फैसलों पर सवाल उठाने और जवाबदेही की मांग करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।

जनता के अविश्वास का जवाब पारदर्शिता होना चाहिए, खामोशी नहीं; असहमति का जवाब कानूनी संवाद होना चाहिए, न कि जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग।

अंततः, मतदान का अधिकार लोकतंत्र को जनादेश देता है, विरोध का अधिकार नागरिकों को अपनी आवाज उठाने का अवसर देता है और कानून का शासन इन दोनों की रक्षा करता है। न तो राज्य और न ही कोई राजनीतिक दल संविधान से ऊपर है।

Share:

Comments

Leave a comment